Thursday, September 11, 2014

Information about the soul | आत्मा के बारे में जानकारी

जैसे घी के साथ मिट्टी मिली हुई है और उसको हमने गर्म कर दिया है | मिट्टी से मिला होने पर भी घी तो घी ही है, मिट्टी अलग द्रव्य है और घी अलग | गर्म होते हुए भी वह घी अपने स्वभाव में अर्थात चिकनेपने में ही विद्यमान है | गर्मपने के अभाव में भी चिकनेपने की अर्थात घी की उपलब्धि होती है, परन्तु चिकनेपने के अभाव में घी की उपलब्धि नहीं होती, अतः चिकनापना ही घी का ( स्वभाव ) सर्वस्व है | घी में गर्मी स्वयं नहीं आई अपितु अग्निजन्य है |

 

यहाँ दृष्टांत में मिट्टी के स्थान पर शरीर, चिकनेपने के स्थान पर चैतन्य, गर्मी के स्थान पर भावकर्म और अग्नि के स्थान पर द्रव्यकर्म हैं | मिट्टी और घी के मिश्रण के समान शरीर व् चैतन्य मिलकर एक से भास् रहे हैं, परन्तु हैं वे पृथक-पृथक द्रव्य, और गर्म घी के समान चैतन्य भी राग-द्वेष आदि भाव कर्मों से तप्तायमान हो रहा है, परन्तु ये सारे विकारी भाव हैं चेतना के अपने नहीं, द्रव्यकर्म-जन्य हैं, द्रव्यकर्म के उदय से आत्मा में हुए हैं अतः पर ही हैं |

 

चीज़ें वहाँ दोनों ही हैं - ज्ञान भी और कर्म भी और देखने वाला यह स्वयं है | इसे स्वयं ही चुनाव करना है कि मैं अपने आपको ज्ञान-रूप देखूं या कर्म व् कर्मफल-रूप | अपने को पर रूप देखना तो संसार है| यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि { देखना } पढ़ना नहीं, सुनना नहीं, कहना नहीं - मात्र देखना | ज़ोर देखने पर है, और अपने को अपने-रुप देखना सो मोक्ष है | अपने को अपने रूप देखना ही मोक्षरूप है, मोक्ष का मार्ग है, सम्यग्दर्शन है, स्वानुभूति है | "पर से हटना " अपने में आना है, "अपने में आना" पर से हटना है ज़ोर अपने में आने पर है | परमार्थ अपने में लगना है -अपने में लगना वह धर्म है पर से हटना तो मात्र व्यवहार है | मैं चेतन ज्ञान-दर्शन मई हूँ |

 

स्वयं विचार कीजिये।

 

भोजन में भाव शुद्धि भी जरूरी

भोजन पर भावनाओं का भी गहरा असर पड़ता है इसलिए व्यक्ति को निराेगी रहने के लिए भोजन शुद्ध भाव से ग्रहण करना चाहिए। क्रोध, ईर्ष्या, उत्तेजना, चिंता, मानसिक तनाव, भय आदि की स्थिति में किया गया भोजन शरीर में दूषित रसायन पैदा करता है। इससे शरीर कई रोगों से घिर जाता है। शुद्ध चित्त से प्रसन्नतापूर्वक किया गया आहार शरीर को पुष्ट करता है। कुत्सित विचार और भावों के साथ कि गए भोजन से व्यक्ति कभी स्वस्थ नहीं रह सकता। इसी के साथ भोजन बनाने वाले व्यक्ति के भाव भी शुद्ध होने चाहिए। उसे भी ईर्ष्या, द्वेश, क्रोध आदि से ग्रस्त नहीं होना चाहिए। इस तरह इन चारों शुद्धियों के साथ भोजन ग्रहण करें तो निश्चित रूप से हमारा मन निर्मल रहेगा और शरीर भी स्वस् रहेगा।

 

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Sunday, September 7, 2014

नवकार वाली यानि माला कैसे गिने ?

 

नवकार वाली यानि माला कैसे गिने ?

 

नवकार वाली के 108 मणको को पंचपरमेष्ठी के 108 गुणों को जीवन में धारण करने स्वरूप गिना जाता है !

 

* उन समस्त गुणों के प्रति आदर, सम्मान का भाव प्रगटाने के लिए तथा माला गिनते समय एक एक गुण का स्मरण कर अपनी अंतरात्मा में उतारने का पुरुषार्थ करने के स्वरूप गिना जाता है

 

* अपने मन में स्थित पाप करने की वृति तथा पापकर्म की शक्ति का नाश करने के भाव के साथ गिना जाता है

 

* माला धागे की सर्वथा योग्य मानी जाती है, चंदन या चांदी की माला को भी शुभ माना गया है, प्लास्टिक की माला उपयोग नही करनी चाहिए , शान्ति तथा शुभ कार्य के लिए सफेद रंग की माला लेनी चाहिए

 

* माला गिनने का स्थान एवं वस्त्र भी शुद्ध-पवित्र होने चाहिए

 

* माला गिनते समय मुँह पूर्व दिशा की और होना चाहिए, पूर्व दिशा अनुकूल हो तो उत्तर दिशा की और मुँह करके जाप करना चाहिए

 

* सहज भाव से होंठ बंद रखकर, दांत एक दुसरे को स्पर्श करें, मात्र स्वयं ही जान सके, इस प्रकार मन में ही जाप करना चाहिए

 

* प्रात:काल ब्रह्म समय अर्थात सूर्योदय से पहले की चार घडी (1 hr 36 mts) का समय सर्वोत्तम है

 

* नवकार मंत्र के जाप-ध्यान से शरीर में 72 हजार नाड़ियों में चेतन्य शक्ति का संचार होता है, जिसका अंत:करण पर असर होता है

 

पंच परमेष्ठी के 108 गुणों को भाव में धारण कर, भावों को कषायों से मुक्त कर किया गया जाप...आधि, व्याधि, उपाधि तथा विघ्नों का नाश होने के साथ-साथ जीवन में परम् शांति तथा मोक्ष की प्राप्ति भी होती है

 

 

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Seva kya hai? | सेवा क्या है?

🌲सेवा क्या है? 🌲 सेवा कर्म काटने का माध्यम है। सेवा आपके मन को विनम्र बनाती है। तन को चुस्त रखती है। मन में स्थिरता का माहौल पैदा करती...