Thursday, September 11, 2014

भोजन में भाव शुद्धि भी जरूरी

भोजन पर भावनाओं का भी गहरा असर पड़ता है इसलिए व्यक्ति को निराेगी रहने के लिए भोजन शुद्ध भाव से ग्रहण करना चाहिए। क्रोध, ईर्ष्या, उत्तेजना, चिंता, मानसिक तनाव, भय आदि की स्थिति में किया गया भोजन शरीर में दूषित रसायन पैदा करता है। इससे शरीर कई रोगों से घिर जाता है। शुद्ध चित्त से प्रसन्नतापूर्वक किया गया आहार शरीर को पुष्ट करता है। कुत्सित विचार और भावों के साथ कि गए भोजन से व्यक्ति कभी स्वस्थ नहीं रह सकता। इसी के साथ भोजन बनाने वाले व्यक्ति के भाव भी शुद्ध होने चाहिए। उसे भी ईर्ष्या, द्वेश, क्रोध आदि से ग्रस्त नहीं होना चाहिए। इस तरह इन चारों शुद्धियों के साथ भोजन ग्रहण करें तो निश्चित रूप से हमारा मन निर्मल रहेगा और शरीर भी स्वस् रहेगा।

 

** Visit: http://jainismSansar.blogspot.com for more or like www.fb.com/jainismSansar  or G+ profile https://plus.google.com/102175120666184498438/ **

 

 

जैन धर्म के क्रांतिकारी मुनी श्री तरुण सागर जी के अंतिम दर्शन

जैन धर्म के क्रांतिकारी मुनी श्री तरुण सागर जी के अंतिम दर्शन मुनी श्री ने अपने कड़वे प्रवचन द्वारा सब के दिलो में मिठास भर दी थी. ...