Saturday, November 19, 2016

Suvichar - सुविचार - पाप पुण्य का भेद

पुण्य किसी को दगा देता नहीं।
पाप किसी का सगा होता नहीं।



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Monday, November 7, 2016

My prayer - मेरी प्रार्थना

⁠⁠⁠   अतिसुन्दर प्रार्थना   
          सुकून उतना ही देना, 
  प्रभु जितने से जिंदगी चल जाए, 
     औकात बस इतनी देना, कि, 
        औरों  का भला हो जाए, 
    रिश्तो में गहराई इतनी हो, कि, 
          प्यार से निभ जाए, 
    आँखों में शर्म इतनी देना, कि, 
       बुजुर्गों का मान रख पायें, 
     साँसे पिंजर में इतनी हों, कि, 
        बस नेक काम कर जाएँ, 
          बाकी उम्र ले लेना, कि, 
      औरों पर बोझ न बन जाएँ

My Prayer
My Prayer

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Friday, November 4, 2016

Gyan panchami ki aaradhana - ज्ञान पंचमी की आराधना

✍ज्ञान से बडी कोई शक्ति नहीं,
✍ज्ञान से बडा कोई बल नही,
✍ज्ञान से बड़ा कोई धन नही,
✍ज्ञान से बड़ी कोई पूजा नहीं,
✍ज्ञान से बड़ी कोई साधना नहीं,
✍ज्ञान से बड़ी कोई आराधना नहीं,


ज्ञान पंचमी की आराधना..
 ज्ञान की आराधना का दिन है।
तीर्थंकर भगवान् महावीर ने अपनी देशना में कहा है... स्थाई सुख के साधन है...  ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप l

◾सुख में बाधा डालने वाले है...
क्रोध, मान, माया और लोभ l


❇ ये पाँच ज्ञान की आराधना में बाधक कारण है, अतः 
अह पंचहिं ठाणेहिं, जेहिं सिक्खा न लब्भइ ।
थंभा कोहा पमाएणं, रोगेणालस्सए णय प ।।
अर्थात् : अहंकार, क्रोध, प्रमाद, रोग और आलस्य... ज्ञान-प्राप्ति में बाधक कारण है l


***********************************
  ज्ञानपंचमी दिवस की क्रिया - आराधना...
***********************************
 जिनालय में जाकर बच्चों द्वारा ज्ञान के साधन : पुस्तक काँपी, पैन, पैसिल आदि चढवाकर ज्ञान की वासक्षेप से पुजा जरूर कराये l
आज से ज्ञान पंचमी की आराधना तप शुरू करने का विधान है, जिसकी अवधि 5 वर्ष 5 माह होती है....
ज्ञान पंचमी की क्रिया -
51 - लोगस्स का काउस्सग
51 - प्रदक्षिणा
51 - खमासमणा
51 - साथियाँ
       ==   "ऊँ ह्रीँ णमो नाणस्स"  ==
इस पद की 20 नवकार वाली,
उपवास, आयंबिल, एकासना आदि तप से करे, सामायिक, प्रतिक्रमण, देववंदन आदि करे l

******************************
 *नोटः* यह लिखने का उद्धेश्य भी ज्ञान की आराधना को ओर गतिमान कार्यरूप देना ही है, कृपया अन्यथा न समझे l

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ज्ञान वडूं संसार मां, ज्ञान परम् सुख हेत,
ज्ञान विना जग जीवड़ा, न लहे तत्व संकेत l

ज्ञान आत्मा का मौलिक गुण है, ज्ञानावर्णीय कर्म के कारण यह गुण आवरण वाला हो गया है - यह आवरण दूर होते ही आत्मा अपने मूल गुण युक्त प्रकट हो जाती है ।  सम्यग् ज्ञान आत्मा के लिए कितना आवश्यक है उसका स्पष्टीकरण आगम में कहा है - "पढमं नाणो तओ दया" "प्रथम् ज्ञान ने पछी अहिंसा" अर्थात् प्रथम् ज्ञान और बाद में महाव्रत, व्रत, नियम आदि l जैनागमों में धर्म को सूक्ष्म बुद्धि से करने का विधान है, स्थूल बुद्धि से किया जाने वाला धर्म - अधर्म के खाते में चला जाता है, अत: सम्यग् ज्ञान को जानना प्रथम आवश्यक है l शुभम् अस्तु ।।
जैनिज्म : सद्-गति से परम्-गति की ओर...
........
 *जय जिनेन्द्र*

ज्ञान पंचमी और उसका महत्त्व

ज्ञान पंचमी और उसका महत्व एवं उससे जुडी प्रचलित कथा…

भाव एवं क्रिया (कार्य) के द्वारा कर्म-बंधन का अनुपम उदारहण…

भरतखंड में अजितसेन राजा का वरदत्त नामक एक पुत्र था, वह राजा का अत्यंत दुलारा था। उसका बोध (ज्ञान) नहीं बढ़ पाया, अच्छे कलाविदों एवं ज्ञानियों आदि के पास रखने पर वह ज्ञानवान नहीं बन सका।
उसकी यह स्थिति देखकर राजा बहुत खिन्न रहता था, सोचता था की मुर्ख रहने पर यह प्रजा का पालन किस प्रकार करेगा…? राजा अजितसेन ने सोचा -”

मैंने पुत्र उत्पन्न करके उसके जीवन-निर्माण का उत्तरदायित्व अपने सिर पर लिया है, अगर इस दायित्व को मैं ना निभा सका तो पाप का भागी होऊँगा।

इस प्रकार सोचकर राजा ने पुरस्कार देने की घोषणा करवाई की जो कोई विद्वान उसके राजकुमार को शिक्षित कर देगा उसे यथेष्ट पुरस्कार दिया जाएगा, मगर कोई भी विद्वान् ऐसा नहीं मिला जो उस राजकुमार को कुछ सिखा सकता, राजकुमार कुछ भी ना सीख सका…उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर ही रहा।

* शिक्षा के अभाव के साथ उसका शारीरिक स्वास्थ भी खतरे में पड़ गया, उसे कोढ़ का रोग लग गया। लोग उसे घृणा की दृष्टि से देखने लगे…सैंकड़ों दवाएँ चलीं, पर कोढ़ ना गया, ऐसी स्थिति में विवाह-सम्बन्ध कैसे हो सकता था…? कौन अपनी लड़की उसे देने को तैयार होता…?

* एक सिंहदास नामक सेठ की लड़की को भी दैवयोग से ऐसा ही रोग लग गया, उस सेठ की लड़की गुणमंजरी भी कोढ़ से ग्रस्त हो गयी, वह लड़की गूँगी भी थी, उस काल में, आज के समान गूंगों, बहरों और अंधों की शिक्षा की सुविधा नहीं थी…कोई लड़का उस लड़की के साथ सम्बन्ध करने को तैयार नहीं हुआ। गूँगी और सदा बीमार रहने वाली लड़की को भला कौन अपनाता…?

एक बार भ्रमण करते हुए विजयसेन नामक एक धर्माचार्य वहाँ पहुँचे, वे विशिष्ट ज्ञानवान थे और दुःख का मूल कारण बतलाने में समर्थ थे, वे नगर के बाहर एक उपवन में ठहरे। ज्ञान की महिमा के विषय में उनका प्रवचन प्रारम्भ हुआ।

उन्होंने कहा-” सभी दुखों का कारण अज्ञान और मोह है। जीवन के मंगल के लिए इनका विसर्जन होना अनिवार्य है।” आचार्य महाराज की देशना पूरी हुई।

सिंहदास श्रेष्टि ने उनसे प्रश्न किया -महाराज !

मेरी पुत्री की इस अवस्था का क्या कारण है…? किस कर्म के उदय से यह स्थिति उत्पन्न हुई है…? आचार्य ने उत्तर में बतलाया – “इसने पूर्वजन्म में ●ज्ञानावर्णीय कर्म का गाढ़ बंधन किया है।”

वृत्तांत इस प्रकार है – – –

जिनदेव की पत्नी सुंदरी थी, वह पाँच लड़कों और पाँच लड़कियों की माता थी। सबसे बड़ी लड़की का नाम लीलावती था। घर में संपत्ति की कमी नहीं थी, उसने अपने बच्चों को इतना लाड़प्यार किया की वे ज्ञान नहीं प्राप्त कर सके। सुंदरी सेठानी के बच्चे समय पर पढ़ते नहीं थे। बहानेबाजी किया करते और अध्यापक को उल्टा त्रास देते थे। जब अध्यापक उन्हें उपालंभ देता और डांटता तो सेठानी उस पर चिड़ जाती। एक दिन विद्द्याशाला में किसी बच्चे को सजा दी गयी तो सेठानी ने चंडी का रूप धारण कर लिया। पुस्तकें चूल्हे में झोंक दीं और दूसरी सामग्री नष्ट-भ्रष्ट कर दी। उसने बच्चों को सीख दी – शिक्षक इधर आवे तो लकड़ी से उसकी पूजा करना।हमारे यहाँ किस चीज़ की कमी है जो पोथियों के साथ माथा पच्ची की जाए…? कोई आवश्यकता नहीं है पढने-लिखने की।

सेठानी के कहने से लड़के पढ़ने नहीं गए। दो-चार दिन बीत गए, शिक्षक ने इस बात की सूचना दी तो सेठ ने सेठानी से पूछा, सेठानी आगबबूला हो गयी। बोली – मुझ पर क्यों लांछन लगाते हो – लड़के तुम्हारे, लडकियां तुम्हारी…तुम जानो तुम्हारा काम जाने।

पति पत्नी के बीच इस बात को लेकर खींचतान बढ़ गयी। खींचतान ने कलह का रूप धारण किया और फिर पत्नी ने अपने पति पर कुंडी से प्रहार कर दिया।

आचार्य बोले – गुणमंजरी वही सुंदरी है… ज्ञान के प्रति तिरस्कार का भाव होने से यह गूँगी रूप में जन्मी है।
राजा अजितसेन ने भी अपने पुत्र वरदत्त का पूर्व वृत्तांत पुछा। कहा – भगवन ! अनुग्रह करके बतलाइये की राजकुल में उत्पन्न होकर भी यह निरक्षर और कोढ़ी क्यों है…?

आचार्य ने अपने ज्ञान का उपयोग कर कहा – वरदत्त ने भी ज्ञान के प्रति दुर्भावना रखी थी। इसके पूर्व जीवन में ज्ञान के प्रति घोर उदासीनता की वृति थी।

श्रीपुरनगर में वसु नाम का सेठ था।उसके दो पुत्र थे – वसुसार और वसुदेव। वे कुसंगति में पड़कर दुर्व्यसनी हो गए, शिकार करने लगे। वन में विचरण करने लगे और निरपराध जीवों की हत्या करने में आनंद मानने लगे। एक बार वन में सहसा उन्हें एक मुनिजन के दर्शन हो गए। पूर्व संचित पुण्य का उदय आया और संत का समागम हुआ।

इन कारणों से दोनों भाइयों के चित्त में वैराग्य उत्पन्न हो गया। दोनों पिता की अनुमति प्राप्त करके दीक्षित हो गए, दोनों चारित्र की आराधना करने लगे।

शुद्ध चारित्र के पालन के साथ वसुदेव के ह्रदय में अपने गुरु के प्रति श्रद्धाभाव था, उसने ज्ञानार्जन कर लिया।कुछ समय पश्चात गुरूजी का स्वर्गवास होने पर वह आचार्य पद पर प्रतिष्टित हुआ…शासन सूत्र उसके हाथ में आ गया।

उधर वसुसार की आत्मा में महामोह का उदय हुआ, वह खा-पीकर पड़ा रहता, संत कभी प्रेरणा करते तो कहता कि – निद्रा में सब पापों की निवृति हो जाती है। निद्रा के समय मनुष्य ना झूठ बोलता है, ना चोरी करता है, ना अब्रह्म का सेवन करता है, ना क्रोधादि करता है, अतएव सभी पापों से बच जाता है, इस प्रकार की भ्रांत धारणा उसके मन में बैठ गयी। वसुसार अपना अधिक समय निद्रा में व्यतीत करने लगा।

वसुदेव ने गुरुभक्ति के कारण तत्त्वज्ञान प्राप्त किया था, अतः वह आचार्य पद पर आसीन हो गए थे। जिज्ञासु संत सदा उन्हें घेरे रहते थे, कभी कोई वाचना लेने के लिए आता तो कोई शंका के समाधान के लिए… उन्हें क्षणभर का भी अवकाश नहीं मिलता। प्रातःकाल से लेकर सोने के समय तक ज्ञानाराधक साधू-संतों की भीड़ लगी रहती। मानसिक और शारीरिक श्रम के कारण वसुदेव थक कर चूर हो जाते थे। सहसा उनको विचार आया की छोटा भाई वसुसार ज्ञान नहीं पढ़ा, वह बड़े आराम से दिन गुजारता है। मैंने सीखा, पढ़ा तो मुझे क्षण भर भी आराम नहीं। विद्वानों ने ठीक कहा है – पढने से तोता पिंजरे में बंद किया जाता है, और नहीं पढ़ने से बगुला स्वच्छन्द घूमता है। मेरे ज्ञान-ध्यान का क्या लाभ…? अच्छा होता भाई की तरह मैं भी मुर्ख ही होता, तो मुझे भी कोई हैरान नहीं करता।

कहा जाता है की इस प्रकार ज्ञानाराधना से थक कर उसने 3-3 दिन के लिए बोलना बंद कर दिया। कर्मोदय के कारण वसुदेव के अंतःकरण में दुर्भावना आ गयी, उसने ज्ञान की विराधना की, इस प्रकार दीक्षा एवं तपस्या के प्रभाव से उसने राजकुल में जन्म ले लिया किन्तु ज्ञान की विराधना करने से कोढ़ी और निरक्षरता प्राप्त की।
धर्म बोध…ज्ञान की विधिवत आराधना करने से और ज्ञान की भक्ति करने से कोढ़ तो क्या… अगाढ़ घाती कर्म भी नष्ट हो जाते है… ऐसा जिनवाणी का कथन है।

ज्ञान पंचमी और उसका महत्त्व

ज्ञान पंचमी और उसका महत्व एवं उससे जुडी प्रचलित कथा…

भाव एवं क्रिया (कार्य) के द्वारा कर्म-बंधन का अनुपम उदारहण…

भरतखंड में अजितसेन राजा का वरदत्त नामक एक पुत्र था, वह राजा का अत्यंत दुलारा था। उसका बोध (ज्ञान) नहीं बढ़ पाया, अच्छे कलाविदों एवं ज्ञानियों आदि के पास रखने पर वह ज्ञानवान नहीं बन सका।
उसकी यह स्थिति देखकर राजा बहुत खिन्न रहता था, सोचता था की मुर्ख रहने पर यह प्रजा का पालन किस प्रकार करेगा…? राजा अजितसेन ने सोचा -”

मैंने पुत्र उत्पन्न करके उसके जीवन-निर्माण का उत्तरदायित्व अपने सिर पर लिया है, अगर इस दायित्व को मैं ना निभा सका तो पाप का भागी होऊँगा।

इस प्रकार सोचकर राजा ने पुरस्कार देने की घोषणा करवाई की जो कोई विद्वान उसके राजकुमार को शिक्षित कर देगा उसे यथेष्ट पुरस्कार दिया जाएगा, मगर कोई भी विद्वान् ऐसा नहीं मिला जो उस राजकुमार को कुछ सिखा सकता, राजकुमार कुछ भी ना सीख सका…उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर ही रहा।

* शिक्षा के अभाव के साथ उसका शारीरिक स्वास्थ भी खतरे में पड़ गया, उसे कोढ़ का रोग लग गया। लोग उसे घृणा की दृष्टि से देखने लगे…सैंकड़ों दवाएँ चलीं, पर कोढ़ ना गया, ऐसी स्थिति में विवाह-सम्बन्ध कैसे हो सकता था…? कौन अपनी लड़की उसे देने को तैयार होता…?

* एक सिंहदास नामक सेठ की लड़की को भी दैवयोग से ऐसा ही रोग लग गया, उस सेठ की लड़की गुणमंजरी भी कोढ़ से ग्रस्त हो गयी, वह लड़की गूँगी भी थी, उस काल में, आज के समान गूंगों, बहरों और अंधों की शिक्षा की सुविधा नहीं थी…कोई लड़का उस लड़की के साथ सम्बन्ध करने को तैयार नहीं हुआ। गूँगी और सदा बीमार रहने वाली लड़की को भला कौन अपनाता…?

एक बार भ्रमण करते हुए विजयसेन नामक एक धर्माचार्य वहाँ पहुँचे, वे विशिष्ट ज्ञानवान थे और दुःख का मूल कारण बतलाने में समर्थ थे, वे नगर के बाहर एक उपवन में ठहरे। ज्ञान की महिमा के विषय में उनका प्रवचन प्रारम्भ हुआ।

उन्होंने कहा-” सभी दुखों का कारण अज्ञान और मोह है। जीवन के मंगल के लिए इनका विसर्जन होना अनिवार्य है।” आचार्य महाराज की देशना पूरी हुई।

सिंहदास श्रेष्टि ने उनसे प्रश्न किया -महाराज !

मेरी पुत्री की इस अवस्था का क्या कारण है…? किस कर्म के उदय से यह स्थिति उत्पन्न हुई है…? आचार्य ने उत्तर में बतलाया – “इसने पूर्वजन्म में ●ज्ञानावर्णीय कर्म का गाढ़ बंधन किया है।”

वृत्तांत इस प्रकार है – – –

जिनदेव की पत्नी सुंदरी थी, वह पाँच लड़कों और पाँच लड़कियों की माता थी। सबसे बड़ी लड़की का नाम लीलावती था। घर में संपत्ति की कमी नहीं थी, उसने अपने बच्चों को इतना लाड़प्यार किया की वे ज्ञान नहीं प्राप्त कर सके। सुंदरी सेठानी के बच्चे समय पर पढ़ते नहीं थे। बहानेबाजी किया करते और अध्यापक को उल्टा त्रास देते थे। जब अध्यापक उन्हें उपालंभ देता और डांटता तो सेठानी उस पर चिड़ जाती। एक दिन विद्द्याशाला में किसी बच्चे को सजा दी गयी तो सेठानी ने चंडी का रूप धारण कर लिया। पुस्तकें चूल्हे में झोंक दीं और दूसरी सामग्री नष्ट-भ्रष्ट कर दी। उसने बच्चों को सीख दी – शिक्षक इधर आवे तो लकड़ी से उसकी पूजा करना।हमारे यहाँ किस चीज़ की कमी है जो पोथियों के साथ माथा पच्ची की जाए…? कोई आवश्यकता नहीं है पढने-लिखने की।

सेठानी के कहने से लड़के पढ़ने नहीं गए। दो-चार दिन बीत गए, शिक्षक ने इस बात की सूचना दी तो सेठ ने सेठानी से पूछा, सेठानी आगबबूला हो गयी। बोली – मुझ पर क्यों लांछन लगाते हो – लड़के तुम्हारे, लडकियां तुम्हारी…तुम जानो तुम्हारा काम जाने।

पति पत्नी के बीच इस बात को लेकर खींचतान बढ़ गयी। खींचतान ने कलह का रूप धारण किया और फिर पत्नी ने अपने पति पर कुंडी से प्रहार कर दिया।

आचार्य बोले – गुणमंजरी वही सुंदरी है… ज्ञान के प्रति तिरस्कार का भाव होने से यह गूँगी रूप में जन्मी है।
राजा अजितसेन ने भी अपने पुत्र वरदत्त का पूर्व वृत्तांत पुछा। कहा – भगवन ! अनुग्रह करके बतलाइये की राजकुल में उत्पन्न होकर भी यह निरक्षर और कोढ़ी क्यों है…?

आचार्य ने अपने ज्ञान का उपयोग कर कहा – वरदत्त ने भी ज्ञान के प्रति दुर्भावना रखी थी। इसके पूर्व जीवन में ज्ञान के प्रति घोर उदासीनता की वृति थी।

श्रीपुरनगर में वसु नाम का सेठ था।उसके दो पुत्र थे – वसुसार और वसुदेव। वे कुसंगति में पड़कर दुर्व्यसनी हो गए, शिकार करने लगे। वन में विचरण करने लगे और निरपराध जीवों की हत्या करने में आनंद मानने लगे। एक बार वन में सहसा उन्हें एक मुनिजन के दर्शन हो गए। पूर्व संचित पुण्य का उदय आया और संत का समागम हुआ।

इन कारणों से दोनों भाइयों के चित्त में वैराग्य उत्पन्न हो गया। दोनों पिता की अनुमति प्राप्त करके दीक्षित हो गए, दोनों चारित्र की आराधना करने लगे।

शुद्ध चारित्र के पालन के साथ वसुदेव के ह्रदय में अपने गुरु के प्रति श्रद्धाभाव था, उसने ज्ञानार्जन कर लिया।कुछ समय पश्चात गुरूजी का स्वर्गवास होने पर वह आचार्य पद पर प्रतिष्टित हुआ…शासन सूत्र उसके हाथ में आ गया।

उधर वसुसार की आत्मा में महामोह का उदय हुआ, वह खा-पीकर पड़ा रहता, संत कभी प्रेरणा करते तो कहता कि – निद्रा में सब पापों की निवृति हो जाती है। निद्रा के समय मनुष्य ना झूठ बोलता है, ना चोरी करता है, ना अब्रह्म का सेवन करता है, ना क्रोधादि करता है, अतएव सभी पापों से बच जाता है, इस प्रकार की भ्रांत धारणा उसके मन में बैठ गयी। वसुसार अपना अधिक समय निद्रा में व्यतीत करने लगा।

वसुदेव ने गुरुभक्ति के कारण तत्त्वज्ञान प्राप्त किया था, अतः वह आचार्य पद पर आसीन हो गए थे। जिज्ञासु संत सदा उन्हें घेरे रहते थे, कभी कोई वाचना लेने के लिए आता तो कोई शंका के समाधान के लिए… उन्हें क्षणभर का भी अवकाश नहीं मिलता। प्रातःकाल से लेकर सोने के समय तक ज्ञानाराधक साधू-संतों की भीड़ लगी रहती। मानसिक और शारीरिक श्रम के कारण वसुदेव थक कर चूर हो जाते थे। सहसा उनको विचार आया की छोटा भाई वसुसार ज्ञान नहीं पढ़ा, वह बड़े आराम से दिन गुजारता है। मैंने सीखा, पढ़ा तो मुझे क्षण भर भी आराम नहीं। विद्वानों ने ठीक कहा है – पढने से तोता पिंजरे में बंद किया जाता है, और नहीं पढ़ने से बगुला स्वच्छन्द घूमता है। मेरे ज्ञान-ध्यान का क्या लाभ…? अच्छा होता भाई की तरह मैं भी मुर्ख ही होता, तो मुझे भी कोई हैरान नहीं करता।

कहा जाता है की इस प्रकार ज्ञानाराधना से थक कर उसने 3-3 दिन के लिए बोलना बंद कर दिया। कर्मोदय के कारण वसुदेव के अंतःकरण में दुर्भावना आ गयी, उसने ज्ञान की विराधना की, इस प्रकार दीक्षा एवं तपस्या के प्रभाव से उसने राजकुल में जन्म ले लिया किन्तु ज्ञान की विराधना करने से कोढ़ी और निरक्षरता प्राप्त की।
धर्म बोध…ज्ञान की विधिवत आराधना करने से और ज्ञान की भक्ति करने से कोढ़ तो क्या… अगाढ़ घाती कर्म भी नष्ट हो जाते है… ऐसा जिनवाणी का कथन है।

Saturday, October 29, 2016

नीलवर्णा पार्श्वनाथ भगवान - मांडव (M.P.)

श्री नीलवर्णा पार्श्वनाथ भगवान की अलोकिक और मनभावन यह प्रतिमा जी...सुपार्श्वनाथ भगवान के प्रमुख तीर्थ स्थल मांडवगड़ m.p. में स्थित हे...

यह प्रतिमा जी मूलनायक भगवान के मंदिर के निचे बने तलघर में हे..
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दीपावली 2016 एवं नुत्तन वर्ष कीमंगल शुभ कामनाएं!

आप सभी को
प्रभु श्री महावीर जैसी शक्ति के साथ क्षमा
गुरु श्री गौतम जैसी लब्धि के साथ विनय
अभयकुमार जैसी बुद्धि के साथ निर्मलता
बाहुबलीजी जैसे बल के साथ विवेक
धन्ना शालीभद्र जैसी रिद्धि सिद्धि के साथ त्याग
वज्रकुमार जैसा स्वाध्याय प्रेम
श्री आनंदघनजी जैसा अध्यात्म प्रेम
श्रेणिक महाराजा जैसी प्रभुभक्ति
कुमारपाल महाराजा जैसी गुरुभक्ति
कायवन्ना सेठ जैसा सौभाग्य
पुण्य श्रावक जैसी समता
केसरियाजी जैसा भण्डार
प्राप्त हो
आप सभी को 
दीपावली एवं नुत्तन वर्ष की
मंगल शुभ कामनाएं!

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Friday, September 2, 2016

14 dereams of mata trishla

महारानी त्रिशला के 14 शुभ स्वप्न...

भगवान महावीर के जन्म से पूर्व एक बार महारानी त्रिशला नगर में हो रही अद्भुत रत्नवर्षा के बारे में सोच रही थीं, यह सोचते-सोचते वे ही गहरी नींद में सो गई, उसी रात्रि को अंतिम प्रहर में महारानी ने 14 शुभ मंगलकारी स्वप्न देखे।

वह आषाढ़ शुक्ल षष्ठी का दिन था। सुबह जागने पर रानी के महाराज सिद्धार्थ से अपने स्वप्नों की चर्चा की और उसका फल जानने की इच्छा प्रकट की।
राजा सिद्धार्थ एक कुशल राजनीतिज्ञ के साथ ही ज्योतिष शास्त्र के भी विद्वान थे।
उन्होंने रानी से कहा कि एक-एक कर अपना स्वप्न बताएं। वे उसी प्रकार उसका फल बताते चलेंगे, तब महारानी त्रिशला ने अपने सारे स्वप्न उन्हें एक-एक कर विस्तार से सुनाएं।
आइए जानते है भगवान महावीर के जन्म से पूर्व महारानी द्वारा देखे गए चौदह अद्भुत स्वप्न :-

पहला स्वप्न :-  स्वप्न में एक अति विशाल श्वेत हाथी दिखाई दिया।   
     फल : ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राजा सिद्धार्थ ने पहले स्वप्न का फल बताया : उनके घर एक अद्भुत पुत्र-रत्न उत्पन्न होगा।

दूसरा स्वप्न : श्वेत वृषभ।
      फल : वह पुत्र जगत का कल्याण करने वाला होगा।

तीसरा स्वप्न : श्वेत वर्ण और लाल अयालों वाला सिंह।
      फल : वह पुत्र सिंह के समान बलशाली होगा।

चौथा स्वप्न : कमलासन लक्ष्मी का अभिषेक करते हुए दो हाथी।
     फल : देवलोक से देवगण आकर उस पुत्र का अभिषेक करेंगे।

पांचवां स्वप्न : दो सुगंधित पुष्पमालाएं
     फल : वह धर्म तीर्थ स्थापित करेगा और जन-जन द्वारा पूजित होगा।

छठा स्वप्न : पूर्ण चंद्रमा।
      फल : उसके जन्म से तीनों लोक आनंदित होंगे।

सातवां स्वप्न : उदय होता सूर्य।
     फल : वह पुत्र सूर्य के समान तेजयुक्त और पापी प्राणियों का उद्धार करने वाला होगा।

आठवां स्वप्न : लहराती ध्वजा ।
      यह पुत्र सारे विश्व में धर्म की पताका लहराएगा ।

नौवां स्वप्न : कमल पत्रों से ढंके हुए दो स्वर्ण कलश।
      फल : वह पुत्र अनेक निधियों का स्वामी निधिपति होगा।

दसवां स्वप्न : कमलों से भरा पद्म सरोवर।
      फल : एक हजार आठ शुभ लक्षणों से युक्त पुत्र प्राप्त होगा।

ग्यारवाँ स्वप्न : हीरे-मोती और रत्नजडि़त स्वर्ण सिंहासन।
     फल : आपका पुत्र राज्य का स्वामी और प्रजा का हितचिंतक रहेगा।

बाहरवा स्वप्न : स्वर्ग का विमान।
     फल : इस जन्म से पूर्व वह पुत्र स्वर्ग में देवता होगा।

तेहरवां स्वप्न : रत्नों का ढेर।
     फल : यह पुत्र अनंत गुणों से सम्पन्न होगा।

चौहदवां स्वप्न : धुआंरहित अग्नि।
     वह पुत्र सांसारिक कर्मों का अंत करके मोक्ष (निर्वाण) को प्राप्त होगा।

पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला को ज्ञात हो गया...उनके घर एक ऐसी आत्मा जन्म लेने वाली है...जो युगों युगों तक तीनों लोको को अपने कल्याणमयी संदेश से लाभान्वित करती रहेगी ।
प्रभु का जन्म होने वाला है...ख़ुशी अपार आई है...आओ झूमों नाचो गाओ...
#jainismSansar #jainism #jain #mahavir #tirthankar #jain

Wednesday, August 31, 2016

What PARYUSHAN means...?

What PARYUSHAN means...?
💎   PARYUSHAN means Festival of self friendship and realisation of soul. Festival of sacrifice, penance & endurance.

Festival of soul purification & self search, time to keep aside the post, wealth & prestige & be with the God.

The  time to forget & forgiveness make the enemy a friend & increase the
  【  LOVE and KINDNESS  】

🚩 1st - Day of Paryusan:
The day of making the mind & soul pure and concentrate in VITRAAG

🚩 2nd - Day of Paryushan:
On this day with the help of our kind speech spread the fragrance of inspiring virtues & constructive activities. Donate with free hand & become a KING.

🚩 3rd - Day of Paryushan:
To make the Mind (soul) & Body Pure and pious with the self of sacrifice & penance. Self control & friendship is also practice. Meditation for enlightment.

🚩 4th - Day of Paryushan:
Rare occasion of gaining AATMA-LAXMI

🚩 5th - Day of Paryushan:
The day of "KALPASUTRA" sacred document of Jainism. this day Bhagwan Mahavira's birth is read and celebrated with special celebrations, a part of which is the auction of 14 items, dreams by the Lords mother Trishala Devi, while she was carrying him.

🚩 6th - Day of Paryushan :
"SWAN" floating in the
MANSAROVAR of Jain Empire (Religion SHASAN)

🚩 7th - Day of Paryushan :
Day of Divine message of Tolerance & power of endurance.

🚩 8th - Day of Paryushan :
"SANVATSARI" The Day of the grand 'GATE WAY' of  "SALVATION" (MOKSHA)

Jainism : Sadgati se param Gati ki aur....
.....

तीर्थंकर परमात्मा जी के नव अंग की ही पूजा क्यों की जाती है ?

तीर्थंकर परमात्मा जी के नव अंग की ही पूजा क्यों की जाती है ?

नव अंग
१. अंगूठा
२. घुटना
३. हाथ
४. कंधा
५. मस्तक
६. ललाट
७. कंठ
८.  हृदय
९. नाभि ॥

तीर्थंकर परमात्मा जी के नव अंग की ही पूजा क्यों की जाती है ?

प्रश्न १.- अंगूठे की पूजा क्यो
की जाती है ?

उत्तर - तीर्थंकर परमात्मा जी ने केवलज्ञान करने के लिए तथा आत्म कल्याण हेतु जन~जन को प्रतिबोध देने के लिए चरणों से विहार किया था, अतः अंगूठे की पूजा की जाती है !

प्रश्न २-. घुटनों की पूजा क्यों की जाती है ?

उत्तर .- घुटनों की पूजा करते समय यह याचना करनी चाहिए की ~•~हॆ परमात्मा~•~ साधना काल मे आपने घुटनों के बल खडे रह कर साधना की थी और केवलज्ञान को प्राप्त किया था मुझे भी ऎसी शक्ति देना की में खडे~खडे साधना कर सकु ॥

प्रश्न ३-. हाथ की पूजा क्यो कि जाती है ?

उत्तर- तीर्थंकर परमात्मा जी ने दिक्षा लेने से पूर्व बाह्म निर्धनता को वर्षिदान देकर दुर किया था और केवलज्ञान प्राप्ति के बाद देशना एवं दिक्षा देकर आंतरिक गरीबी को मिटाया था उसी प्रकार मे भी संयम धारण कर भाव द्रारिद्र को दुर कर संकू !

प्रश्न ४.- कंधे की पूजा क्यों की जाती है ?

उत्तर - . तीर्थंकर परमात्मा जी अनंत शक्ति होने पर भी उन्होने किसी जीव को न कभी दुःखी किया न कभी अपने बल का अभिमान किया वैसे ही आत्मा की अनंत शक्ति को प्राप्त करने एवं निरभिमानी बनने कि याचना कंधों की पूजा के द्वारा की जाती है ॥

प्रश्न ५.- मस्तक की पूजा क्यों की जाती है ?

उत्तर- तीर्थंकर परमात्मा जी केवलज्ञान प्राप्त कर लोक के अग्रभाग सिध्दशिला पर विराजमान हो गये है उसी प्रकार की सिद्धि को प्राप्त करने के लिए मस्तक की पूजा की जाती है ॥

प्रश्न ६-- ललाट की पूजा क्यों की जाती है ?

उत्तर - तीर्थंकर परमात्मा जी तीनो लोको मे पूजनीय होने से तिलक के समान है उसी अवस्था को प्राप्त करने के लिए ललाट की पूजा की जाती है ॥

प्रश्न ७-. कंठ कि पूजा क्यों की जाती है ?

उत्तर - . तीर्थंकर परमात्मा जी ने कंठ से देशना दे कर जीवो का उद्धार किया था इस प्रयोजन से कंठ की पूजा की जाती है ॥

प्रश्न - ८. ह्रदय की पूजा क्यों की जाती है ?

उत्तर- तीर्थंकर परमात्मा जी ने उपकारी और अपकारी सभी जीवो पर समान भाव रखने के कारण ह्रदय की पूजा की जाती है ॥

प्रश्न- ९. नाभि की पूजा क्यों की जाती है ?

उत्तर - नाभि मे आठ रुचक प्रदेश है जो कर्म रहित है मेरी आत्मा भी आठ रुचक प्रदेशों की भाँति कर्म मुक्त बने इसी भावना से तीर्थंकर परमात्मा जी के नाभि की पूजा की जाती है.

Friday, August 5, 2016

सुविचार - इंसान की पहचान माफ़ी

🙏🏻सुप्रभात्🙏🏻

🤗 *माफ़ी वही दे सकता है जो अंदर से मज़बूत हो...*

*खोखले इंसान सिर्फ बदले की आग में जलते रहते है...*

💞 जो आपकी खुशी के
लिये हार मान लेता
है,
उससे आप कभी जीत
नही सकते...
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Monday, August 1, 2016

सुविचार - संत और वसंत

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹       
संत का आना और वसंत का आना एक
सा होता है क्योंकि......
जब वसंत आता है तो प्रकृति सुधर
जाती है और
जब गुरू आता है तो संस्कृति सुधर
जाती है...
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
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💐गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं 💐                                                                  🙏 🙏 #jainismSansar #jain #guru #gurupurnima #jainism #suvichar

Saturday, July 23, 2016

जीवन परिचय - २१ श्री नमीनाथ जी




 २१ श्री नमीनाथ जी

जन्म स्थान

 मिथिला 

निर्वाण स्थान

 सम्मेद शिखरजी 

पिता जी

 विजया राजा 

माता जी

 विपरा रानी 

चिन्ह / प्रतिक

 हरा कमल  

इक्कीसवें तीर्थंकरनमिनाथ के पिता का नाम विजय और माता का नाम सुभद्रा/विपरा (सुभ्रदा-वप्र)था। आप स्वयं मिथिला के राजा थे। आपका जन्म इक्ष्वाकू कुल में श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मिथिलापुरी में हुआ था। आषाढ़ मास के शुक्ल की अष्टमी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कैवल्य की प्राप्ति हुई। वैशाख कृष्ण की दशमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- उत्पल (हरा कमल ), चैत्यवृक्ष- बकुल, यक्ष- गोमेध, यक्षिणी- अपराजिता

जीवन परिचय - २४ श्री महावीर स्वामीजी




 २४ श्री महावीर स्वामीजी

जन्म स्थान

 कुण्डलपुर 

निर्वाण स्थान

 पावापुरी 

पिता जी

सिद्धार्थ राजा  

माता जी

त्रिशला  रानी 

चिन्ह / प्रतिक

सिंह 

चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म नाम वर्धमान, पिता का नाम सिद्धार्थ तथा माता का नाम त्रिशला (प्रियंकारिनी) था। आपका जन्म चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी के दिन कुंडलपुर में हुआ था। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की दशमी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा वैशाख शुक्ल की दशमी के दिन कैवल्य की प्राप्ति हुई। 42 वर्ष तक आपने साधक जीवन बिताया। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन आपको पावापुरी पर 72 वर्ष में निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- सिंह, चैत्यवृक्ष- शाल, यक्ष- गुह्मक, यक्षिणी- पद्मा सिद्धायिनी

जीवन परिचय - २३ श्री पार्श्वनाथ जी




 २३ श्री पार्श्वनाथ जी

जन्म स्थान

वाराणसी 

निर्वाण स्थान

सम्मेद शिखरजी

पिता जी

अश्वसेन  

माता जी

वामादेवी 

चिन्ह / प्रतिक

नाग  

आज से लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व पौष कृष्ण एकादशी के दिन जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी में हुआ था। उनके पिता का नाम अश्वसेन और माता का नाम वामादेवी था। राजा अश्वसेन वाराणसी के राजा थे। 

चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को ही कैवल्य की प्राप्ति हुई। श्रावण शुक्ल की अष्टमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- सर्प, चैत्यवृक्ष- धव, यक्ष- मातंग, यक्षिणी- कुष्माडी हैं।


जैन पुराणों के अनुसार तीर्थंकर बनने के लिए पार्श्वनाथ को पूरे नौ जन्म लेने पड़े थे। पूर्व जन्म के संचित पुण्यों और दसवें जन्म के तप के फलत: ही वे तेईसवें तीर्थंकर बने।

पुराणों के अनुसार 
       पहले जन्म में वे मरुभूमि नामक ब्राह्मण बने, 
       दूसरे जन्म में वज्रघोष नामक हाथी
       तीसरे जन्म में स्वर्ग के देवता
       चौथे जन्म में रश्मिवेग नामक राजा
       पांचवें जन्म में देव
       छठे जन्म में वज्रनाभि नामक चक्रवर्ती सम्राट
       सातवें जन्म में देवता
       आठवें जन्म में आनंद नामक राजा
       नौवें जन्म में स्वर्ग के राजा इन्द्र और 
       दसवें जन्म में तीर्थंकर बने।

दिगंबर धर्म के मतावलंबियों के अनुसार पार्श्वनाथ बाल ब्रह्मचारी थे, जबकि श्वेतांबर मतावलंबियों का एक धड़ा उनकी बात का समर्थन करता है, लेकिन दूसरा धड़ा उन्हें विवाहित मानता है। इसी प्रकार उनकी जन्मतिथि, माता-पिता के नाम आदि के बारे में भी मतभेद बताते हैं।

बचपन में पार्श्वनाथ का जीवन राजसी वैभव और ठाटबाठ में व्यतीत हुआ। जब उनकी उम्र सोलह वर्ष की हुई और वे एक दिन वन भ्रमण कर रहे थे, तभी उनकी दृष्टि एक तपस्वी पर पड़ी, जो कुल्हाड़ी से एक वृक्ष पर प्रहार कर रहा था। यह दृश्य देखकर पार्श्वनाथ सहज ही चीख उठे और बोले - 'ठहरो! उन निरीह जीवों को मत मारो।' उस तपस्वी का नाम महीपाल था।

अपनी पत्नी की मृत्यु के दुख में वह साधु बन गया था। वह क्रोध से पार्श्वनाथ की ओर पलटा और कहा - किसे मार रहा हूं मैं? देखते नहीं, मैं तो तप के लिए लकड़ी काट रहा हूं।



 पार्श्वनाथ ने व्यथित स्वर में कहा- लेकिन उस वृक्ष पर नाग-नागिन का जोड़ा है। महीपाल ने तिरस्कारपूर्वक कहा - तू क्या त्रिकालदर्शी है लड़के.... और पुन: वृक्ष पर वार करने लगा। तभी वृक्ष के चिरे तने से छटपटाता, रक्त से नहाया हुआ नाग-नागिन का एक जोड़ा बाहर निकला। एक बार तो क्रोधित महीपाल उन्हें देखकर कांप उठा, लेकिन अगले ही पल वह धूर्ततापूर्वक हंसने लगा।

तभी पार्श्वनाथ ने नाग-नागिन को णमोकार मंत्र सुनाया, जिससे उनकी मृत्यु की पीड़ा शांत हो गई और अगले जन्म में वे नाग जाति के इन्द्र-इन्द्राणी धरणेन्द्र और पद्‍मावती बने और मरणोपरांत महीपाल सम्बर नामक दुष्ट देव के रूप में जन्मा।

पार्श्वनाथ को इस घटना से संसार के जीवन-मृत्यु से विरक्ति हो गई। उन्होंने ऐसा कुछ करने की ठानी जिससे जीवन-मृत्यु के बंधन से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सके। कुछ वर्ष और बीत गए। जब वे 30 वर्ष के हुए तो उनके जन्मदिवस पर अनेक राजाओं ने उपहार भेजें। अयोध्या का दूत उपहार देने लगा तो पार्श्वनाथ ने उससे अयोध्या के वैभव के बारे में पूछा।

उसने कहा- 'जिस नगरी में ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और अनंतनाथ जैसे पांच तीर्थंकरों ने जन्म लिया हो उसकी महिमा के क्या कहने। वहां तो पग-पग पर पुण्य बिखरा पड़ा है।

इतना सुनते ही भगवान पार्श्वनाथ को एकाएक अपने पूर्व नौ जन्मों का स्मरण हो आया और वे सोचने लगे, इतने जन्म उन्होंने यूं ही गंवा दिए। अब उन्हें आत्मकल्याण का उपाय करना चाहिए और उन्होंने उसी समय मुनि-दीक्षा ले ली और विभिन्न वनों में तप करने लगे। चैत्र कृष्ण चतुर्दशी के दिन उन्हें कैवल्यज्ञान प्राप्त हुआ और वे तीर्थंकर बन गए। वे सौ वर्ष तक जीवित रहे। तीर्थंकर बनने के बाद का उनका जीवन जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में गुजरा और फिर श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन उन्हें सम्मेदशिखरजी पर निर्वाण प्राप्त हुआ।
 

जीवन परिचय - २२ श्री नेमिनाथ जी




 २२ श्री नेमिनाथ जी

जन्म स्थान

सौर्यपुरा 

निर्वाण स्थान

गिरनार जी 

पिता जी

समुद्र विजय 

माता जी

शिवा देवी  

चिन्ह / प्रतिक

शंख  

बावीसवें तीर्थंकर नेमिनाथ के पिता का नाम राजा समुद्रविजय और माता का नाम शिवादेवी था। आपका जन्म श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी को शौरपुरी (मथुरा) में यादववंश में हुआ था। शौरपुरी (मथुरा) के यादववंशी राजा अंधकवृष्णी के ज्येष्ठ पुत्र समुद्रविजय के पुत्र थे नेमिनाथ। अंधकवृष्णी के सबसे छोटे पुत्र वासुदेव से उत्पन्न हुए भगवान श्रीकृष्ण इस प्रकार नेमिनाथ और श्रीकृष्ण दोनों चचेरे भाई थे। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को गिरनार पर्वत पर कैवल्य की प्राप्ति हुई। आषाढ़ शुक्ल की अष्टमी को आपको उज्जैन या गिरनार पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक चिह्न- शंख, चैत्यवृक्ष- मेषश्रृंग, यक्ष- पार्श्व, यक्षिणी- बहुरूपिणी

Seva kya hai? | सेवा क्या है?

🌲सेवा क्या है? 🌲 सेवा कर्म काटने का माध्यम है। सेवा आपके मन को विनम्र बनाती है। तन को चुस्त रखती है। मन में स्थिरता का माहौल पैदा करती...